ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने वकील चंद्र पाल सिंह को तीन दिन हिरासत में रखा हाईकोर्ट ने 75 हज़ार रुपये मुआवज़ा देने का आदेश

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इलाहाबाद में काम करने वाले एक वकील चंद्र पाल सिंह को फरवरी में ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने एक पड़ोसी की मामूली शिकायत पर तीन दिन हिरासत में रखा था. अब उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न सिर्फ़ उनकी हिरासत को ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया, बल्कि राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर उन्हें पच्चीस हज़ार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से कुल 75 हज़ार रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया है.जब कानून के जानकार व्यक्ति के साथ ऐसा हो सकता है, तो सोचिए आम आदमी को किन हालात से गुज़रना पड़ता होगा.’यह परेशान करने वाला ख़याल वकील चंद्र पाल सिंह के मन में बार-बार आ रहा था, जब उन्हें उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में निवारक हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) के नियमों के तहत तीन दिन तक गैर-कानूनी हिरासत में रखा गया.इस साल फरवरी में पुलिस चंद्र पाल सिंह को उनके पड़ोसी की मामूली-सा गेट लगाकर रास्ता रोकने की शिकायत पर जबरन उठा ले गई थी

हालांकि, अन्य लोगों की तरह पुलिस के इस कदम को अपनी किस्मत मानकर चुपचाप आगे बढ़ जाने के बजाय चंद्र पाल सिंह ने इसके खिलाफ लड़ने का फैसला किया. उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में ‘हेबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की. 8 जून को कोर्ट ने न सिर्फ़ उनकी हिरासत को ‘गैर-कानूनी’ करार दिया, बल्कि राज्य सरकार को यह भी आदेश दिया कि वह उन्हें तीन दिन की गैर-कानूनी हिरासत के लिए 75,000 रुपये (25,000 रुपये प्रति दिन) का मुआवज़ा छह हफ़्ते के अंदर दे.

कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह तीन महीने के भीतर अनुशासनात्मक जांच करे और दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति- चाहे वह गाजियाबाद के शालीमार गार्डन के सहायक पुलिस आयुक्त हों या टीलामोड थाने के थाना प्रभारी (एसएचओ), या फिर दोनों (उनकी गलती के अनुपात में- से वह राशि वसूल करे.

सिंह ने इस पूरे मामले पर सवाल उठाते हुए पूछा, ‘जब मेरे साथ ऐसा हो सकता है, तो दूसरे लोगों के साथ क्या-क्या होता होगा? मैं कानून का जानकार हूं इसलिए मैंने कानून का सहारा लिया. बाकी लोग क्या करेंगे?’

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